

SBI गुरबक्शगंज शाखा की मनमानी उजागर करने पर अब नोटिस का खेल!
ग्राहक की आवाज उठाने पर पत्रकार पर दबाव बनाने की साजिश?
रायबरेली।
जनपद रायबरेली की स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, गुरबक्शगंज शाखा (ब्रांच कोड 08055) एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
10 फरवरी को समाज तक मीडिया द्वारा ग्राहकों के साथ हो रहे कथित उत्पीड़न की खबर प्रकाशित की गई थी।
इसके ठीक अगले दिन यानी 11 फरवरी को बैंक द्वारा एक महिला ग्राहक को अचानक कानूनी नोटिस भेज दिया गया।
यह महज़ संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित दबाव बनाने की रणनीति प्रतीत होती है।
🔹 आधार कार्ड के आधार पर हुआ था लोन पास
सूत्रों के अनुसार, शाखा प्रबंधक द्वारा स्वयं ग्राहक को बुलाकर
➡️ केवल आधार कार्ड के आधार पर
➡️ सिविल ठीक होने की बात कहकर
➡️ तीन लोन की जानकारी दी गई
और उसी आधार पर बिजनेस लोन स्वीकृत किया गया।
ग्राहक का कहना है कि उसने बैंक के आश्वासन पर विश्वास कर लोन लिया, लेकिन बाद में कुछ परिस्थितियाँ ऐसी बनीं जिनके कारण वह समय पर पूरा भुगतान नहीं कर सकी।
🔹 खबर के बाद अचानक नोटिस!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि— यदि बैंक को कानूनी कार्यवाही करनी ही थी तो
❓ पहले वकील के माध्यम से नोटिस क्यों नहीं भेजा गया?
❓ खबर चलने के ठीक अगले दिन ही नोटिस क्यों भेजा गया?
❓ क्या यह खबर को दबाने की कोशिश नहीं है?
यह प्रतीत होता है कि
➡️ जैसे ही समाज तक मीडिया ने ब्रांच की कार्यशैली उजागर की
➡️ वैसे ही बैंक ने ग्राहक पर कानूनी दबाव बनाना शुरू कर दिया।
🔹 अब कुर्की की धमकी?
नोटिस में कुर्की और सिविल रिकवरी सूट की बात कही गई है, जो यह दर्शाता है कि
ग्राहक को डराने और चुप कराने का प्रयास किया जा रहा है।
जब बैंक स्वयं लोन स्वीकृति में लापरवाही करे
और बाद में ग्राहक पर पूरा दोष मढ़ दे
तो यह सीधा-सीधा अन्याय है।
सवाल यह नहीं कि लोन क्यों नहीं चुकाया गया
सवाल यह है कि लोन किस प्रक्रिया से दिया गया?
अगर— ✔ सिर्फ आधार के आधार पर
✔ बिना ठोस जांच के
✔ खुद बुलाकर लोन पास किया गया
तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ ग्राहक की नहीं बल्कि बैंक अधिकारियों की भी बनती है।
🗣️ पत्रकारिता का अपराध?
समाज तक मीडिया के संपादक विजय प्रताप सिंह द्वारा जब ग्राहकों की आवाज उठाई गई
तो क्या उसका जवाब नोटिस और कुर्की से दिया जाएगा?
यदि ऐसा है तो यह
➡️ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला
➡️ गरीब और कमजोर उपभोक्ताओं के खिलाफ संस्थागत अत्याचार
➡️ और बैंकिंग सिस्टम की मनमानी का उदाहरण है।
समाज तक मीडिया की मांग:
1️⃣ लोन स्वीकृति प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच हो
2️⃣ आधार कार्ड पर लोन स्वीकृति की वैधता स्पष्ट की जाए
3️⃣ ग्राहक को डराने की नीति बंद हो
4️⃣ जिम्मेदार बैंक अधिकारियों पर कार्यवाही हो
✍️ निष्कर्ष:
यह मामला केवल एक लोन का नहीं,
यह मामला है — ➡️ आम उपभोक्ता की गरिमा का
➡️ पत्रकारिता की स्वतंत्रता का
➡️ और सरकारी बैंक की जवाबदेही का।
अब देखना यह है कि
भारतीय स्टेट बैंक इस पूरे प्रकरण पर क्या स्पष्टीकरण देता है
या फिर चुप्पी ही उसकी स्वीकारोक्ति मानी जाएगी।

