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अयोध्या में खाद्य विभाग का ‘अनोखा खेल’: प्रस्ताव गायब, अनुमोदन हासिल! अब रायबरेली में भी उठे गंभीर सवाल
अखबार की खबर ने खोली विभागीय कार्यप्रणाली की परतें, क्या रायबरेली में भी दोहराया जा रहा है वही खेल? शिकायतकर्ताओं पर दबाव बनाने के आरोपों से व्यवस्था कठघरे में
रायबरेली। अयोध्या जनपद से प्रकाशित एक खबर ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अप्रैल-मई 2026 में प्रकाशित ‘माया अवध’ की खबर का शीर्षक है— “अयोध्या में खाद्य विभाग का अनोखा खेल—प्रस्ताव गायब, अनुमोदन हासिल”।
अखबार की रिपोर्ट में सरकारी फाइलों में प्रक्रिया और प्रस्तावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आईजीआरएस शिकायत की जांच में ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्हें महज प्रशासनिक स्तर की गलती मानना आसान नहीं है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि शिकायतकर्ता की शिकायत के बाद विभागीय प्रक्रिया और अधिकारियों के तबादले से जुड़ी फाइलों में गंभीर विसंगतियां सामने आईं।
अखबार ने 2023, 2024 और 2025 की फाइलों पर भी उठाए सवाल
प्रकाशित खबर के मुताबिक, जांच में यह बात सामने आने का दावा किया गया कि वर्ष 2023, 2024 और 2025 में क्षेत्र परिवर्तन की फाइलें मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी के प्रस्ताव के बिना आगे बढ़ती रहीं।
रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि यदि शासनादेश के अनुसार प्रस्ताव और निर्धारित प्रक्रिया आवश्यक थी, तो फिर बिना प्रस्ताव के फाइल कैसे आगे बढ़ी और अनुमोदन कैसे हासिल हुआ?
अखबार ने यह भी सवाल उठाया कि यदि नियमों के बिना प्रक्रिया पूरी मानी जा सकती है तो फिर शासनादेश आखिर किसलिए जारी किए जाते हैं?
रिपोर्ट में ‘फाइल गायब’ होने से लेकर सीधे अनुमोदन तक का सवाल
अखबार की रिपोर्ट में एक ऐसे प्रकरण का भी उल्लेख है जिसमें प्रक्रिया के दौरान प्रस्ताव फाइल में मौजूद नहीं था और बाद में मामला प्रशासनिक स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े करता दिखाई दिया।
रिपोर्ट में सहायक आयुक्त (खाद्य) ग्रेड-2 की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया कि निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी कर फाइल तैयार किए जाने और वरिष्ठ अधिकारियों की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ रहते हुए अनुमोदन प्राप्त किए जाने का आरोप जांच रिपोर्ट में सामने आया।
यानी सवाल सिर्फ एक फाइल का नहीं—सवाल उस पूरी कार्यप्रणाली का है जिसमें नियम, प्रस्ताव और अनुमोदन की प्रक्रिया के बीच ही गंभीर विसंगतियां दिखाई दे रही हैं।
अब यही सवाल रायबरेली से भी
अयोध्या की इस प्रकाशित खबर के बाद रायबरेली में भी यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इसी तरह की कार्यप्रणाली यहां भी अपनाई जा रही है?
रायबरेली में संबंधित अधिकारी की कार्यशैली को लेकर शिकायतकर्ताओं द्वारा गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जब वे खाद्य विभाग से संबंधित अनियमितताओं अथवा कथित भ्रष्टाचार की शिकायत लेकर सामने आते हैं तो समस्या का निष्पक्ष समाधान करने के बजाय उन्हें दबाव में लेने अथवा डराने-धमकाने का प्रयास किया जाता है।
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
क्योंकि अगर शिकायत गलत है तो अधिकारी को दस्तावेजों के साथ जवाब देना चाहिए, और यदि शिकायत सही है तो शिकायतकर्ता पर दबाव डालने के बजाय दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
अयोध्या के आरोपों का रिकॉर्ड सामने आए, रायबरेली की भी जांच हो
यह भी चर्चा का विषय रहा है कि अयोध्या में संबंधित अधिकारी को लेकर पूर्व में भी शिकायतें और आरोप सामने आते रहे हैं और कुछ मामलों में जांच/कार्रवाई की स्थिति बनी है। इन दावों की पुष्टि संबंधित सरकारी जांच रिपोर्ट और अभिलेखों से की जानी चाहिए।
लेकिन यदि वास्तव में किसी जांच में अधिकारी की भूमिका या लापरवाही सामने आई है और कार्रवाई अभी तक लंबित है, तो जनता यह सवाल पूछने का अधिकार रखती है—
आखिर कार्रवाई क्यों लंबित है?
किस स्तर पर फाइल रुकी है?
जांच के बाद भी निर्णय क्यों नहीं हुआ?
और शिकायतकर्ताओं को न्याय कब मिलेगा?
रायबरेली में अब ‘फाइलों का खेल’ नहीं, जवाब चाहिए
समाज तक न्यूज़ का सवाल बिल्कुल स्पष्ट है—
अयोध्या में अखबार ने जिन सवालों को दस्तावेजों और जांच के आधार पर उठाया, क्या उन्हीं सवालों की जांच रायबरेली में भी होगी?
क्या शासन रायबरेली में संबंधित अधिकारी की पूर्व शिकायतों, जांच रिपोर्टों, तबादला/क्षेत्र परिवर्तन से जुड़ी फाइलों और शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच कराएगा?
और यदि शिकायतकर्ताओं को धमकाने या दबाव में लेने के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो क्या उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी?
खाद्य सुरक्षा विभाग जनता के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा विभाग है। यहां किसी भी प्रकार की लापरवाही, नियमों की अनदेखी या शिकायतकर्ता को दबाने की कोशिश को सामान्य प्रशासनिक मामला मानकर टाला नहीं जा सकता।
अब सवाल एक अधिकारी का नहीं, पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है
अयोध्या की खबर ने सवाल खड़ा किया है—“प्रस्ताव गायब, अनुमोदन हासिल कैसे?”
अब रायबरेली पूछ रहा है—
क्या यहां भी फाइलों की जांच होगी?
क्या शिकायतकर्ताओं के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या अयोध्या से जुड़े पुराने मामलों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक होगी?
और अगर किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप जांच में प्रमाणित पाए जाते हैं, तो कार्रवाई कब होगी?
समाज तक न्यूज़ इन सवालों को दस्तावेजों और उपलब्ध प्रमाणों के साथ जनता के बीच रखेगा। संबंधित अधिकारी/विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादकीय सावधानी: जहां तक आपके पास जांच रिपोर्ट/आदेश की प्रमाणित प्रति नहीं है, वहां “दोषी” या “भ्रष्ट” के बजाय “आरोप”, “जांच में सामने आने का दावा”, “रिपोर्ट के अनुसार” और “कार्रवाई लंबित होने की बात” लिखना बेहतर रहेगा। इससे खबर की धार भी बनी रहेगी और तथ्यात्मक आधार भी मजबूत रहेगा।

Samaj Tak
Author: Samaj Tak

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