रायबरेली जनपद के जतुवा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएससी) में मरीजों से बाहर की महंगी दवाइयां लिखने का मामला सामने आया है। राम कुमारी, निवासी कोरिहर, ने बताया कि उन्हें टाइफाइड बुखार है और उनका इलाज इसी अस्पताल में चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले ही दिन उन्हें 2000 रुपये की बाहरी दवाइयां व इंजेक्शन लिखे गए, और अब पुनः 1800 रुपये के इंजेक्शन लिखे गए हैं।
राम कुमारी की यह पीड़ा केवल उनकी नहीं, बल्कि कई गरीब मरीजों की है, जो सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन महंगी बाहरी दवाइयों का बोझ उठाने को मजबूर हैं।
बृजेश पाठक के आदेशों की अनदेखी?
उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बाहर की दवाइयां लिखने पर सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन इसके बावजूद, रायबरेली के जटवा सीएससी में इन आदेशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी पर भी असर नहीं
स्थानीय मरीजों व उनके परिजनों ने इस अनियमितता की शिकायत मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) रायबरेली से भी की, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। मरीजों का आरोप है कि यह पूरा सिस्टम कमीशनखोरी में लिप्त है, जिससे गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग पर उठते सवाल
स्वास्थ्य विभाग की इस लापरवाही ने पूरे तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या गरीबों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं केवल नाममात्र की रह गई हैं? क्या बाहरी दवाइयों का यह खेल कभी खत्म होगा?
मीडिया की पैनी नजर
समाज तक मीडिया लगातार इस मुद्दे को उजागर कर रहा है और शिकायतों को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहा है। तमाम साक्ष्यों के बावजूद कार्रवाई न होने से यह स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार गहराई तक जड़ें जमा चुका है।
सरकार को इस पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी ताकि गरीब मरीजों को न्याय मिल सके और सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य पूरा हो सके। ✍️विजय प्रताप सिंह (प्रबंध निदेशक )
