रायबरेली में आबकारी नियमों की खुली धज्जियां! पुराने लाइसेंस बोर्डों के सहारे चल रहे शराब के ठेके, विभाग की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
रायबरेली। जनपद में शराब की दुकानों पर नियमों के पालन को लेकर आबकारी विभाग भले ही बड़े-बड़े दावे करता हो, लेकिन जमीनी हकीकत उन दावों की पोल खोलती दिखाई दे रही है। खीरों थाना क्षेत्र के लालपुर स्थित देसी शराब के ठेके और गुरुबक्शगंज थाना क्षेत्र के भीतरगांव स्थित अंग्रेजी शराब के ठेके पर आज भी वर्ष 2025-26 के पुराने लाइसेंस बोर्ड लगे हुए हैं, जबकि वर्तमान में 2026-27 की लाइसेंस अवधि प्रभावी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आबकारी विभाग नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई और जुर्माने की बात करता है, तब इन दुकानों पर पुराने बोर्ड आखिर किसकी शह पर लगे हुए हैं? क्या विभागीय अधिकारियों की नजर इन दुकानों तक नहीं पहुंची, या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है?
समाज तक फाउंडेशन के डायरेक्टर विजय प्रताप सिंह ने मौके पर पहुंचकर दोनों दुकानों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान सामने आया कि लालपुर स्थित देसी शराब की दुकान पर पुराने बोर्ड में मालिक के रूप में एम. जायसवाल का नाम दर्ज है, जबकि भीतरगांव स्थित अंग्रेजी शराब की दुकान के पुराने बोर्ड पर प्रदीप कुमार का नाम अंकित है। दोनों बोर्डों पर समाप्त हो चुकी लाइसेंस अवधि स्पष्ट रूप से लिखी हुई है।
क्या केवल आम जनता के लिए हैं नियम?
आम नागरिक यदि किसी सरकारी नियम का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन जब शराब के ठेकों पर खुलेआम पुराने बोर्ड लगे हों तो विभागीय मशीनरी की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। आखिर वह कौन सी मजबूरी है जिसके कारण आबकारी विभाग की टीमों को यह स्पष्ट उल्लंघन दिखाई नहीं देता?
स्थानीय लोगों का कहना है कि आबकारी विभाग की गाड़ियां और अधिकारी क्षेत्र में लगातार भ्रमण करते दिखाई देते हैं। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि उन्हें इन दुकानों पर लगे पुराने बोर्ड दिखाई नहीं दिए होंगे। यदि दिखाई दिए तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि नहीं दिखाई दिए तो फिर निरीक्षण व्यवस्था की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
जुर्माने की बात, लेकिन कार्रवाई शून्य
पूर्व में आबकारी विभाग की ओर से यह कहा जाता रहा है कि नियमों के विपरीत बोर्ड लगाए जाने अथवा आवश्यक सूचनाएं प्रदर्शित न करने पर ₹5000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जब कथित उल्लंघन सामने है तो क्या विभाग अपने ही नियमों को लागू करेगा या फिर यह नियम केवल कागजों तक सीमित हैं?
विभाग की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल
दो अलग-अलग थाना क्षेत्रों में स्थित शराब की दुकानों पर एक जैसी स्थिति मिलना महज संयोग नहीं माना जा रहा। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि या तो निरीक्षण व्यवस्था पूरी तरह लापरवाह है या फिर नियमों के पालन को लेकर गंभीरता का अभाव है।
आबकारी विभाग की जिम्मेदारी केवल राजस्व वसूली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक शराब दुकान शासन के निर्धारित मानकों और शर्तों के अनुरूप संचालित हो। यदि लाइसेंस अवधि समाप्त होने के कई महीने बाद भी पुराने बोर्ड लगे हुए हैं तो यह विभागीय निगरानी पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है।
समाज तक फाउंडेशन ने उठाई कार्रवाई की मांग
समाज तक फाउंडेशन के डायरेक्टर विजय प्रताप सिंह ने दोनों मामलों को सार्वजनिक करते हुए आबकारी विभाग से मांग की है कि तत्काल जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि वर्ष 2026-27 की लाइसेंस अवधि के बावजूद पुराने बोर्ड क्यों लगे हुए हैं। साथ ही यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अब जनपद की जनता की निगाहें आबकारी विभाग पर टिकी हैं। क्या विभाग अपने ही नियमों का पालन कराएगा या फिर पुराने बोर्डों के सहारे ठेकों का संचालन यूं ही चलता रहेगा? यह आने वाला समय बताएगा।
(नोट: समाचार मौके पर दिखाई दे रही स्थिति और उपलब्ध बोर्डों पर अंकित सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। अंतिम तथ्यात्मक स्थिति विभागीय जांच और आधिकारिक अभिलेखों से ही
स्पष्ट होगी।)

