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​डॉ. भीमराव अंबेडकर: वह गुरु जिन्होंने शिष्य को दिया अपना ‘नाम’, पहचान और भविष्य

नई दिल्ली/मुंबई: भारतीय संविधान के शिल्पकार और आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को पूरी दुनिया जानती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि डॉ. अंबेडकर के ‘अंबेडकर’ बनने के पीछे एक ऐसे ब्राह्मण शिक्षक का हाथ था, जिन्होंने न केवल अपनी जाति की बेड़ियां तोड़ीं, बल्कि अपना कुलनाम (सरनेम) तक शिष्य को समर्पित कर दिया?

​आज ‘समाज तक’ की विशेष रिपोर्ट में हम बात कर रहे हैं कृष्णाजी केशव अंबेडकर की—एक ऐसे गुरु, जिन्हें इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।

​मूल रूप से ‘सकपाल’ थे भीमराव

​बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबासाहेब का असली उपनाम (सरनेम) ‘सकपाल’ था। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल सैन्य सेवा में थे। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में लोग अक्सर अपने गाँव के नाम पर सरनेम रखते थे। भीमराव के गाँव का नाम ‘अंबावडे’ था, जिसके आधार पर स्कूल में उनका नाम ‘अंबावडेकर’ दर्ज किया गया था।

​भेदभाव के दौर में स्नेह की मिसाल

​वह समय छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का चरम दौर था। जब नन्हे भीमराव स्कूल जाते थे, तो उन्हें कक्षा के बाहर बैठना पड़ता था। लेकिन इसी बीच एक शिक्षक थे— कृष्णाजी केशव अंबेडकर। वे एक ब्राह्मण थे, लेकिन उनके मन में भीमराव के प्रति अटूट स्नेह और सम्मान था। वे भीमराव की कुशाग्र बुद्धि से इतने प्रभावित थे कि वे अक्सर अपना भोजन भी भीमराव के साथ साझा करते थे।

​’अंबावडेकर’ से ‘अंबेडकर’ तक का सफर

​कृष्णाजी केशव अंबेडकर को महसूस हुआ कि भीमराव का सरनेम ‘अंबावडेकर’ पुकारने में थोड़ा कठिन है और वे भीमराव को अपने पुत्र के समान मानते थे। इसी स्नेह के चलते उन्होंने स्कूल रिकॉर्ड में भीमराव का उपनाम बदलकर अपना सरनेम ‘अंबेडकर’ दे दिया। यह भारतीय इतिहास की एक विरल घटना थी, जहाँ एक गुरु ने स्वेच्छा से अपनी पहचान अपने शिष्य को सौंप दी।

​केवल नाम ही नहीं, भविष्य भी संवारा

​कृष्णाजी केशव का योगदान सिर्फ नाम देने तक सीमित नहीं रहा। जब भीमराव की उच्च शिक्षा की बात आई, तो आर्थिक तंगी एक बड़ा रोड़ा थी।

  • छात्रवृत्ति की सिफारिश: कृष्णाजी ने ही भीमराव की प्रतिभा का परिचय बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ III से कराया।
  • विदेश जाने का मार्ग: उन्हीं की सिफारिश और मार्गदर्शन का परिणाम था कि भीमराव को उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति मिली, जिसने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया।

​’समाज तक’ का नजरिया

​आज के दौर में जब समाज अक्सर जातिगत आधार पर बंटा हुआ दिखता है, कृष्णाजी केशव अंबेडकर और डॉ. भीमराव अंबेडकर का यह संबंध एक मिसाल पेश करता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षा और मानवता किसी भी दीवार से कहीं ज्यादा ऊँची होती है। एक सच्चा शिक्षक वही है जो अपने छात्र के भीतर की आग को पहचाने और उसे दुनिया रोशन करने के काबिल बनाए।

“इतिहास गवाह है कि जब एक समर्पित गुरु और एक संकल्पित शिष्य मिलते हैं, तो युग परिवर्तन होता है।”

 

ब्यूरो रिपोर्ट, समाज तक

​क्या आपको लगता है कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में आज भी ऐसे गुरु-शिष्य संबंधों की आवश्यकता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

Samaj Tak
Author: Samaj Tak

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